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Economic Survey रिपोर्ट: अधिकतर राज्यों में महंगाई स्थिर/कंट्रोल में रही, ग्रामीण महंगाई में कमी आई।

लोकसभा में आर्थिक समीक्षा 2025-26 पेश करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि 2023 और 2024 की तुलना में अब ग्रामीण महंगाई में स्पष्ट कमी देखने को मिली है। इस अवधि में ग्रामीण मुद्रास्फीति शहरी मुद्रास्फीति से कम रही, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों पर महंगाई का दबाव अपेक्षाकृत घटा। इसके विपरीत, 2023-24 के पूरे वर्ष में ग्रामीण मुद्रास्फीति लगातार शहरी मुद्रास्फीति से ऊपर बनी रही थी।

समीक्षा में यह भी रेखांकित किया गया कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के उपभोग पैटर्न में अंतर इस बदलाव का अहम कारण है। ग्रामीण परिवारों के खर्च में खाद्य वस्तुओं का हिस्सा अधिक होने के चलते खाद्य कीमतों में वृद्धि का प्रभाव ग्रामीण महंगाई पर अधिक पड़ता है। वर्ष 2025 में जैसे ही खाद्य मुद्रास्फीति में नरमी आई, दोनों क्षेत्रों में कुल महंगाई नीचे आई, परन्तु ग्रामीण क्षेत्र में गिरावट अपेक्षाकृत अधिक दर्ज हुई।

राज्यवार स्थिति पर आर्थिक समीक्षा बताती है कि 2025-26 में केरल और लक्षद्वीप में खुदरा मुद्रास्फीति आरबीआई की ऊपरी सहनशीलता सीमा (6%) तक पहुंच गई, जबकि बाकी अधिकांश राज्यों में मुद्रास्फीति 2% से 6% के दायरे में या उससे भी नीचे औसत रूप से बनी रही। साथ ही, राष्ट्रीय स्तर पर महंगाई में कमी का रुझान भी दर्ज किया गया।

समीक्षा के अनुसार, राज्यों में मुद्रास्फीति के उतार-चढ़ाव को केवल व्यापक राष्ट्रीय कारणों से नहीं समझा जा सकता; इसमें स्थानीय स्तर पर कीमतों में होने वाले बदलाव भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। जनवरी 2014 से दिसंबर 2025 तक के मासिक राज्यवार CPI आंकड़ों के आधार पर यह सामने आया कि कुछ राज्य नियमित रूप से राष्ट्रीय औसत से ऊंची या कम मुद्रास्फीति दर्ज करते रहे हैं। अध्ययन यह भी संकेत देता है कि राज्य स्तर पर मुद्रास्फीति में बदलाव पूरी तरह क्षणिक नहीं होते और एक महीने आगे बढ़ने पर भी राष्ट्रीय औसत में कोई बड़ा बदलाव जरूरी नहीं आता। दक्षिण और उत्तर के कुछ दूरस्थ राज्यों में महंगाई राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही, जबकि दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में यह औसतन राष्ट्रीय स्तर से कम दर्ज हुई।

हालांकि, महंगाई की दिशा तय करने में राष्ट्रीय कारकों का योगदान प्रमुख रहा, फिर भी समय के साथ राज्य स्तर पर मुद्रास्फीति का स्वरूप बदलता रहा। लंबे समय के आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि कई राज्यों की औसत मुद्रास्फीति दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है। आगे के परीक्षण में राज्य स्तर की मुद्रास्फीति का राज्य की जीडीपी वृद्धि दर और कोविड के प्रभाव के साथ महत्वपूर्ण और सकारात्मक संबंध पाया गया। दूसरी ओर, औद्योगिक उत्पादन की हिस्सेदारी का संबंध नकारात्मक दिखा, जो यह संकेत देता है कि विनिर्माण क्षेत्र की आपूर्ति क्षमता पर मूल्य दबावों का असर पड़ सकता है। समीक्षा में यह भी उल्लेख है कि GST के कारण राज्य स्तर पर मुद्रास्फीति के अंतर में कीमतों पर स्पष्ट प्रभाव नहीं मिला।

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